Monday, March 29, 2010

सोच रहीं हूँ सोचूं... लेकिन सोचना चाहती नहीं



सोचती हूँ सोचूं
यूँही बैठे-बैठे ख्याल आया की कुछ सोचूं,
जब सोचने बैठी तो लगा क्या होगा सोचके,
क्या लोग बदल जाएंगे,
या वक़्त बदल जाएगा,
ज़िन्दगी आसान हो जाएगी,
या इंसान कि बुद्धि राह पे आएगी,
सोचती हूँ सोचूं लेकिन क्या सोचूं!

ये ज़िन्दगी क्यूँ है,
हम इन्सान क्यों हैं,
हम जीते क्यूँ हैं, हम मरते क्यूँ हैं,
वक़्त क्यूँ ठहर नहीं जाता,
सब अछा क्यूँ  हो  नहीं जाता,
झूठ मर क्यूँ नहीं जाता,
सच वक़्त पे सामने क्यूँ नहीं आता,
सोचती हूँ सोचूं लेकिन क्यूँ सोचूं!

रह-रह के ख्याल आता है मन में
अगर सब सोचें तो क्या होगा जीवन में,
सुधर जाएंगे सबके रात दिन,
थोड़ा आसन हो जाएगा जीवन,
जीवन साँसों की नाज़ुक कड़ी है,
दुनिया जीवन की परीक्षा लेने खड़ी है,
क्यों न इस परीक्षा की घड़ी में, दें एक दुसरे का साथ,
और बनाएं पूरी दुनिया को अपना परिवार!

सोचती हूँ सोचूं लेकिन कब सोचूं!
जब सब खत्म हो जाएगा तब,
या लड़ते-लड़ते थक जाउंगी तब,
जब थक जाएगी ज़िन्दगी तब,
या मैं ज़िन्दगी से थक जाउंगी तब!

वक़्त से जो लड़ा वो न रहा कहीं का, सुना था दादी से बचपन में,
दादी भी हार गयी थी दुनिया से, अब आता है समझ में,
कहती थी वो कि जीवन जीना एक कला है,
वक़्त की मार जो सहले वो सबसे भला है,
पहुँच जाओ चाहे जितनी भी ऊंचाई पे,
हारना पड़ेगा अंत में जीवन कि लड़ाई में,

दादी कि वो बातें तब लगती थीं अजीब,
अब लगता है, थीं वो जीवन के कितने करीब,
अब सोचती हूँ क्यों नहीं वो मेरे पास, कौन बताएगा जीवन के ज़रूरी पाठ,
वक़्त क्यूँ ले गया उनको मुझसे दूर
फिर सोचती हूँ शायद  यही है जीवन का दस्तूर,

वो हर चीज़ जो सोचते हैं सच हो सकती नहीं
शायद इसिलए सोच रहीं हूँ सोचूं... लेकिन सोचना चाहती नहीं!

                                                                                            --- सेतु

फोटो क्रेडिट    
silence by donjuki@deviantart.com

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